प्रकाश पुंज महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती - २
आज हिन्दी राष्ट्रभाषा व राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है भारतीय संस्कृति की महानता के उद्घोषक महर्षि स्वामी दयानन्द जैसे अपने उद्वारकों अपर निस्संदेह गर्व करती है और उनका गौरव गान करती है।
वैचारिक क्रान्ति के अग्रदूत स्वामी जी कर्मवीर महामानव थे। पतन के गर्त में गिरते समाज के प्रति वे अपने कर्म से कैसे उदासीन रह सकते थे? इसलिए उस कर्मशील व्यक्तित्व ने धुन की तरह समाज की जड़ों को खोखला कर रही जाति-पाति, छूत-छात, बल विवहा, पर्दा-प्रथा जैसी कुरीतियों से भारतीय समाज को मुक्त कराने का कर्तव्य वहन किया और इन समस्त कुरीतियों पर कुठाराघात किया। उस महमनीषि ने अज्ञान पर तीव्र प्रहार करने हेतु आर्य समाज व विभिन्न गुरुकुलों की स्थापना द्वारा ज्ञान की शत्-शत् धाराओं को प्रवाहित किया। इसी सन्दर्भ में उन्होंने भारतीय संस्कृति की नींव नारी-जाति के उत्थान हेतु नारी-शिक्षा का अभियान चलाया। आज यदि भारतीय नारी प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष के साथ समानता के स्तर पर खड़ी है, यहां तक कि कुछ क्षेत्रों में तो अग्रणी है तो इसका समस्त श्रेय ऋषिवर स्वामी दयानन्द जैसे शक्ति पुरुष को ही जाता है और उनके इस महत् कार्य के लिए भारतीय नारी वर्ग सदा उस क्रान्तिदृष्टा का ऋणी रहेगा।
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Ved Katha Pravachan - 30 | सम्पूर्ण दुःखों की समाप्ति की कामना | यजुर्वेद मन्त्र 30.3
इस प्रकार महर्षि जैसी दिव्य विभूति ने देशवासियों को नव्य चेतना, नयी जागृति प्रदान कर उन्हें कर्ममय व धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा दी। जागरण का जो शंखनाद उन्होंने की उससे सुप्त राष्ट्रवासी चैतन्य हो उठे थे उनका परमार्थमय जीवन उनकी पावन भक्ति तथा उनका दिव्य ज्ञान युगों-युगों तक हमारी भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करता रहेगा। इसलिए समाज सुधारकों में अग्रदूत, सांस्कृतिक पुनरुत्थान करने वाले अज्ञानांधकार के विनाशक, वैदिक-साहित्य की नविन व्याख्या करने वाले सुधी व्याख्याता, आर्य समाज के संस्थापक, सनातन धर्म को उसकी अतिवादिताओं से अवगत कराने वाले सत्य शोधक मनीषी, सामाजिक कुरीतियों, प्राचीन रूढ़ियों पर प्रहार करने वाले व अस्पृश्यता का निराकरण करने वाले विशाल हृदयी सुधारक, नारी जाति के समादर का भाव विकसित करने वाले नारी शिक्षा के प्रणेता, राष्ट्रीय भावना का प्रसार करने वाले राष्ट्र-प्रेमी एवं 'शुद्धि' को जन्म देने वाले ज्ञानपुंज महर्षि दयानन्द सरस्वती का भारत का कोना-कोना गौरव गान करता है। परन्तु महर्षि के प्रति सच्चा श्रद्धापूर्वक नमन उनके बताए मार्ग पर चलना होगा। उनके उपदेशों को व्यवहार में लाना होगा। क्योंकि आधुनिक परिस्थितियां अत्यंत विकट है। जिस विदेशी सत्ता की राजनितिक अधीनता के विरुद्ध महर्षि ने उद्घोष किया था। ''विदेशी शासन अच्छे से अच्छा क्यों न हो, स्वदेशी शासन की तुलना में अच्छा नहीं।''
आज वैसी ही विदेशी शक्तियां भारत आर्थिकता को नियंत्रित करने का दुःसाहस दिखा रही हैं, उसी प्रकार के विदेशी आक्रान्ता हमारी सांस्कृतिक सम्पदा को तहस-नहस कर डालना चाहते हैं, हमारे युवा वर्ग की मानसिकता को अपने अधीन कर रह हैं। अर्थात् इस बार आक्रमण एक नहीं, कई षड्यन्त्र के रूप में अप्रत्यक्षतः किया जा रहा है। मीडिया को शस्त्र बनाकर आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य संस्कृति की अश्लीलता का वीभत्स नृत्य प्रदर्शित किया जा रहा है और हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट कर चारित्रिक ह्रास द्वारा भारतीय संस्कृति के वर्तमान व भविष्य को कलुषित करने की कुचेष्टा की जा रही है। किन्तु आश्चर्य व दुःख की बात है कि हम फिर भी मौन हैं। राष्ट्र में साम्प्रदायिकता की अग्नि सुलगती है, जाति-भेद की दीवारें सीना ताने खड़ी हैं, नेताओं के लिए देश सेवा 'स्वयंसेवा' बन चुकी है, युवा पीढ़ी अपनी ही संस्कृति से विमुख हो उसका उपहास उड़ा रही है, पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, स्वार्थ मानवता की लील रहे हैं, अंधविश्वास का अस्तित्व आज भी विवेक बुद्धि पर बज्र प्रहार कर रहा है परन्तु फिर भी हम मौन हैं, मूक दर्शक बने बैठे हैं।
आज आवश्यकता है पुनः जागृत होने की और इस जागरण का स्त्रोत है ऋषिवर द्वारा निर्दिष्ट मार्ग। इसके लिए आत्म-मंथन करना होगा। क्या हम उस महान व्यक्तित्व द्वारा निर्दिष्ट पथ के पथिक बनने का सामर्थ्य रखते हैं? क्या हम उनके द्वारा बताए उपदेशों का पालन कर रहे हैं? क्या हम पूर्ण निष्ठा से उनके चरण चिन्हों का अनुसार करने को कृत संकल्प हैं? क्या हम वास्तव में आर्य समाज के सिद्धान्तों पर अडिग हैं ?
यदि हमारा अन्तर्मन, हमारी अन्तरात्मा द्वारा इन प्रश्नों का हमें सकारात्मक उतर प्राप्त होता है तो निश्चय ही राष्ट्र कल्याण व मानव मंगल हेतु किए गए हमारे सभी प्रयास सार्थक होंगे और एक दिन समस्त मनोमालिन्य, हृदयगत कलुषता, ईर्ष्या-द्वेष, घृणा, स्वार्थ का नाश होगा और हम सही मायनों में उस दिव्य व्यक्तित्व स्वामी दयानन्द के अनुयायी कहलाने योग्य होंगे।
कविवर उदयभानु हंस की पंक्तियों में अपनी बात समाप्त करना चाहूंगी -
तुम विष को सुधा सोम, बनाओं तो सही।
सीमा को कभी व्योम, बनाओं तो सही।
कण-कण में वही रूप दिखाई देगा।
पहले अहं को ओम् बनाओं तो सही। - श्रीमती सुशील बाला
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This Time the Attack is being done indirectly in the form of not one, but many conspiracies. The media is displaying a gruesome dance of vulgarity of Western culture in the name of modernism and misleading our young generation by misleading the present and future of Indian culture by character deprivation. But it is a matter of surprise and sadness that we are still silent.
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महर्षि दयानन्द की देश वन्दना आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में एक कर्त्तव्य बोध कराया है। यह बोध देश के प्रत्येक नागरिक के लिए धारण करने योग्य है। भला जब आर्यावर्त में उत्पन्न हुए हैं और इसी देश का अन्न जल खाया-पीया, अब भी खाते पीते हैं, तब अपने माता-पिता तथा पितामहादि के...