प्रकाश पुंज महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती - १
आदिकाल से ही आध्यात्मिक की पुण्य पावन सलिला सतत् प्रवह्मान होकर भारत भूमि को पुनीत करती रही हैं। भारत का प्रत्येक प्रान्त इसके पवित्र स्पर्श से स्नात हुआ हैं। भारत का प्रान्त पंजाब जहां गुरुओं, पीरों फकीरों व वीरों की भूमि होने के निमित्त पवित्र है वहीँ गुजरात मनीषियों व क्रान्तिद्रष्टा महापुरुषों की जन्मभूमि होने का सौभाग्य रखता है। गुजरात जन्मभूमि है- विश्व को अहिंसात्मक क्रान्ति का मार्ग दर्शाने वाले महापुरुष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की। गुजरात मतृभूमि है- ५५२ रियासतों में विभक्त खण्ड-खण्ड बंटे भारत का एकीकरण करने वाले कुशल राजनीतिज्ञ लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की और गुजरात को सौभाग्य प्राप्त है- समस्त राष्ट्र में व्याप्त अज्ञानांधकार को चीरकर ज्ञान की प्रचण्ड दीपशिखा का प्रकाश प्रसारित करने वाले तथा राष्ट्रवासियों के हृदयों पर जमी हुई पाखण्ड की परत पर कुठाराघात कर उसे खण्डित करने वाले दिव्य शक्तिपुंज महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती की जन्मभूमि होने का। सन् १८२४ को काठियावाड़ के टंकारा ग्राम में अवतरित महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसा दिव्य व्यक्तित्व विश्व में एक ही बार पदार्पण करता है। उन जैसा कोई सत्यव्रती न बन सका क्योंकि एक वही मूलशंकर थे जो मंदिर में उठी आशंकाओं के समाधान हेतु परम प्रकाश की तलाश में गृह त्याग कर दृढ़ता से प्रवृत हो सके तथा परम तत्व को पा सके। इसीलिए केवल वही एक ऐसा अलौकिक व्यक्तित्व था जो स्वामी पूर्णानन्द का शिष्यत्व और स्वामी विरजानन्द की आशीष ग्रहण कर मूलशंकर से महर्षि स्वामी दयानन्द बनने का गौरव पा सका।
Motivational speech on Vedas by Dr. Sanjay Dev
Ved Katha Pravachan - 29 | सम्पूर्ण विश्व के सुख व कल्याण की कामना | यजुर्वेद मन्त्र ३०.३
राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्तियां -
साकार दिव्य, गौरव-विराट पौरुष का पुंजीभूत ज्वाल,
मेरी जननी का हिमकिरीट
मेरे भारत का दिव्य भाल जहां कहीं एकता अखण्डित,
जहां प्रेम का स्वर है।
देश-प्रेम में वहां खड़ा, भारत जीवित भास्वर है।
भारत के विराट गौरव ज्वाल से आलोकित इस दिव्य भाल की भास्वरता का श्रेय जाता है - ऋषिवर दयानन्द जैसे महामनीषियों को, संतों-महात्माओं को, विद्वानों को, दिव्य पुरुषों को क्योंकि महनीय व्यक्तियों की महनीयता उनके कर्म के असाधारणत्व में निहित रहती है। कर्म की यही विशेषता उन्हें जान-साधारण से कहीं उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित कर देती है और वे अनुकरणीय व्यक्तित्व बन जाते हैं। ऐसे ही महापुरुष महर्षि दयानन्द सरस्वती के जीवनानुभव विश्व के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गए। धन्य है ऐसा व्यक्तित्व जो स्वयं गरल ग्रहण करके सत्य व स्नेह की अमृत वर्षा करता रहा। धन्य है वह व्यक्तित्व जो विरोध के पत्थरों का धैर्यपूर्वक सामना करता हुआ मानव मंगल के पुष्प लुटाता रहा।
मानव-मंगल हेतु ही ऋषिवर ने तत्कालीन परिस्थितियों के दृष्टिगत तीन प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किए - वैदिक धर्म का प्रचार, राष्ट्रीय भावना का प्रसार व समाज सुधार।
तत्कालीन परिवेश में धर्म वास्तविक अर्थों में प्रायः विलुप्त हो चूका था। उसका अस्तित्व पाखण्डों, अंधविश्वासों, रूढ़ियों, विभ्रमों व अज्ञान के अंधकार के नहर में खो चूका था। महर्षि ने वैदिक धर्म के प्रचार द्वारा ज्ञान का ऐसा अकाशदीप प्रज्वलित किया जिसके प्रकाश ने तत्कालीन परिवेश को तो आलोकित किया ही वह तो आज भी ज्ञान के तिमिर का छेदन कर रहा है।
वेदों के प्रति उनका दृष्टिकोण पूर्णतः वैज्ञानिक था। संस्कृति के प्रति वे पूर्वाग्रही कदापि नहीं थे। यही कारण है कि उनके गहन अध्ययन, चिन्तन, मनन का परिणाम है - 'सत्यार्थ प्रकाश।' सत्यार्थ प्रकाश के रूप उस दिव्य विभूति ने एक ऐसा शाश्वत प्रकाश-स्तम्भ मानव जाति को प्रदान कर उपकृत किया जिसमें प्रत्येक युग में मानव संततियों का मार्दर्शन करने की असीम क्षमता विद्यमान है। इस तथ्य की पुष्टि करता है हमारा इतिहास। भारतीय स्वतंत्रता के अग्रदूत अनेक क्रांतिकारियों के जीवन व विचारधारा पर 'सत्यार्थ प्रकाश' का गहन प्रभाव पड़ा चाहे वे गर्म दलीय नेता 'बाल लाल पाल' थे, देश के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले नौजवान सभा के भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव थे, या रणबांकुरे आज़ाद, यशपाल थे, चाहे कालापानी का भयावह दण्ड भोगने वाले वीर सावरकर थे, चाहे अंग्रेजों को रणभूमि में ललकारने वाले सेनानायक सुभाषचन्द्र बोस थे या लाला हरदयाल, सरदार अजीत सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, यतिन्दास जैसे मां भारती के वीर सपूत थे या फिर 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है' जैसी अंग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती देने वाली पंक्तियों के रचनाकार काकोरी कांड के सूत्रधार क्रान्तिकारी पं० रामप्रसाद बिस्मिल थे जिनकी जीवन दिशा ही 'सत्यार्थ प्रकाश' व आर्य समाज के सिद्धान्तों ने परिवर्तित कर दी थी। जिस प्रकार महर्षि की विचारधारा ने क्रान्तिकारियों को प्रभावित किया उससे उस महनीय व्यक्तित्व की राष्ट्रीयता स्वतः ही ध्वनित हो जाती है। वास्तव में स्वामी जी के पश्चात महात्मा गांधी , पंडित नेहरू जैसे देश के नेताओं ने भारत के सामाजिक विकास हेतु जो लक्ष्य निर्धारित किए, उनका सूत्रपात स्वामी दयानन्द द्वारा पहले ही हो चूका था।
स्वामी जी ने राष्ट्रवासियों में देशाभिमान जागृत किया, उन्हें स्वराज्य की उत्कृष्टता का पाठ पढ़ाया। वे ही प्रथम महापुरुष थे जिन्होंने भारत को भारतीयों के लिए घोषित किया। स्वयं संस्कृत के प्रकांड पंडित और मातृभाषा गुजराती के विद्वान होते हुए भी उन्होंने हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने मद्रास से प्रकाशित पत्र 'हिन्दी प्रचार समाचार' में वक्तव्य दिया-
''हिन्दी के द्वारा सारा भारतवर्ष एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। हिन्दू तो इसके झण्डे के नीचे आ ही जाएंगे, मुसलमानों के लिए भी इसको अपनाना आसान होगा क्योंकि उर्दू भाषा का सारा ढांचा हिन्दी का ही रूप लिए है।'' - श्रीमती सुशील बाला
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The Majesty of India is attributed to the Magnificence of this divine spear, illuminated by the great pride of India - the great sages like Rishivar Dayanand, the saints, the scholars, the divine men, because the dignity of the important people lies in the extravagance of their deeds. This characteristic of karma makes him distinguished on a higher level than life and he becomes an exemplary personality. In this way, the great experience of Maharishi Dayanand Saraswati became the inspiration for the world.
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महर्षि दयानन्द की देश वन्दना आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में एक कर्त्तव्य बोध कराया है। यह बोध देश के प्रत्येक नागरिक के लिए धारण करने योग्य है। भला जब आर्यावर्त में उत्पन्न हुए हैं और इसी देश का अन्न जल खाया-पीया, अब भी खाते पीते हैं, तब अपने माता-पिता तथा पितामहादि के...